रविवार, 15 मार्च 2026

हरीश राणा को न्याय की अश्रुपूर्ण अनुमति

​ग्यारह सावन बीत गए पर, तन पत्थर सा मौन रहा,

अपनी ही जीवित अर्थी का, बोझ भला ये कौन सहा?

पलकों की कोरों में जम कर, पत्थर हुए थे सब आंसू,

आज न्याय की चौखट पर भी, सिसक उठे हैं सब आंसू।

​विवश खड़ी थी न्याय की देवी, हाथ लिए वो कोरा पन्ना,

सोच रही थी— 'जीवन' देना या 'पीड़ा' को ही चुनना?

कानून की सूखी किताबों ने, सांसों की गिनती माँगी थी,

पर उस मां की आंखों ने तो, बेटे की मुक्ति माँगी थी।

​थक गए थे बूढ़े कंधे, नहलाते उस चन्दन को,

हार गया था पिता बेचारा, सींच-सींच उस क्रंदन को।

आज जज की कांपती कलम ने, मूक गवाही दी होगी,

इंसानों के उस दर्द को, 'देव-दुहाई' दी होगी।

​"ले जाओ इसे"— कहा कोर्ट ने, "इसे नींद अब आने दो,

पवित्र अग्नि की गोद में, जलकर पावन हो जाने दो।"

वो पाइप, वो नली, वो पिंजरा, आज अंततः टूटेगा,

कैद थी जो रूह बरसों से, उसका नाता छूटेगा।

​कैसा अजब ये फैसला है, जिसमें रोकर मुस्काए,

बेटे को मरता देख के भी, मां 'आज़ादी' के गुण गाए।

हरीश! तुम्हारी सुप्त आंखों में, अब कोई डर न होगा,

अगला सवेरा जब आएगा, तुम पर कोई ज़बर न होगा।

​अदालत का ये फैसला, इतिहास में एक मिसाल है,

जहां 'मृत्यु' ही सबसे सुंदर, करुणा का एक सवाल है।

जाओ! कि अब स्वर्ग की वादी, तुमको राह दिखाएगी,

ये धरती तुम्हारी तपस्या को, सदियों तक दोहराएगी।

अनीश कुमार उपाध्याय

हरीश राणा की पीड़ा और उनके माता-पिता का मूक क्रंदन

​पत्थरों के शहर में, एक जिंदा पत्थर की पुकार

​ग्यारह साल हुए हैं मुझको, इस बिस्तर से चिपके,

जैसे कोई सूखी डाली, जमीं से हो बिछड़े।

गर्दन के नीचे की दुनिया, वीराना बन बैठी है,

रूह मेरी इस पिंजरे में, चुपचाप लेटी है।

​मैं जिंदा हूं -पर क्या इसको जीवन कहते हैं?

जहां अपनी ही आंखों के आंसू, खुद नहीं बहते हैं।

चेहरे पर बैठी मक्खी भी, अब अपना हक़ जताती है,

हाथ हिलाने की हसरत, बस टीस बन रह जाती है।

​देख नहीं पाता अब मैं, मां की झुकती कमर को, बढ़ते हुए सफ़ेद बालों और पिता की उस डगर को।

जो बूढ़े हाथ लाठी पकड़ते, वो मुझे नहलाते हैं, मेरे हिस्से का सारा दर्द, वो चुपचाप पी जाते हैं।

मेरे घाव नहीं रिसते, अब उनकी ममता रिसती है,

मेरी सांसों की खातिर, उनकी चक्की पिसती है।

हे ईश्वर! क्या यह सजा है या केवल आजमाइश है?

एक बेटा अपने मां-बाप की, मौत की न नुमाइश है।

​मैं मौत नहीं मांगता, मैं तो बस विश्राम मांगता हूं,

अपनी ही अर्थी के कंधों का, थोड़ा सा मान मांगता हूं।

जो कानून जीवन देता है, वो पीड़ा क्यों नहीं पढ़ता?

क्यों एक बेबस का संताप, अदालतों में नहीं चढ़ता?

​छीन लो ये चलती सांसें, तोड़ दो ये बेड़ियां, बहुत चढ़ लीं मेरी पीड़ा ने, जिल्लत की ये सीढ़ियां।

जब तक ये आंखें खुली हैं, बस बोझ बन कर रहूंगा, मुझको सोने दो गहरा, अब और न कुछ कहूंगा।

एक ग्यारह साल का सन्नाटा, अब ख़त्म होना चाहिए,

पथरानी इन आंखों को, अब कम से कम सोना चाहिए।

हे देश के विधाता! मेरी अर्जी पर जरा गौर करना,

मरने का हक दे दो मुझे, जीने से है अब डरना।


अनीश कुमार उपाध्याय

सिलिंडर पुराण: एक 'हल्की' कविता

गैस का चूल्हा मौन खड़ा है, जैसे मौन व्रत धारी,

सिलिंडर बाबा रूठ गए हैं, भारी पड़ी सवारी।

किचन की रानी बैठी कोने में, आंखों में है पानी,

क्योंकि पाइपलाइन के वादों की, खत्म हुई है कहानी।

अब 'लाल परी' घर आती नहीं, बस दर्शन देकर जाती है,

सफेदपोशों के भाषण में ही, पूरी दाल पक जाती है।

कल तक जो 'सब्सिडी' का झुनझुना, हाथ में हमारे था,

आज पता चला वो झुनझुना, बस सपनों का सहारा था।


गैस सिलिंडर अब वस्तु नहीं, 'स्टेटस सिंबल' बन गया है,

पड़ोसी की छत पर खाली डब्बा, जैसे विजय स्तंभ तन गया है।

शादी-ब्याह के शगुन में अब, गहने-कपड़े कौन पूछता है?

दूल्हा वही है तगड़ा भाई, जिसके घर में सिलिंडर गूंजता है!

सड़क पर लाइन ऐसे लगी है, जैसे स्वर्ग का द्वार खुला हो,

हर आदमी अपना पर्चा पकड़े, जैसे जन्म-जन्मांतर से धुला हो।

एजेंसी का बाबू ऐसे घूरता है, जैसे हम कोई गुनहगार हैं,

"अगले महीने आना भाई," यही उसका परम सत्कार है।


वैज्ञानिक कह रहे हैं—मंगल पर पानी मिल जाएगा,

पर घर में चूल्हा जलेगा कैसे? ये कौन समझाएगा?

हमने भी अब 'डिजिटल इंडिया' का, नया मतलब निकाल लिया है,

सिलिंडर की फोटो दीवार पर चिपका कर, मन को मना लिया है।

धुआं नहीं है किचन में अब, क्योंकि आग ही गायब है,

विकास की इस दौड़ में देखो, हम सब बने नायब हैं।

चाय अब ठंडी ही अच्छी लगती है, फैशन का तकाजा है,

गरम खाने की जिद मत करना, यही 'नया दरवाजा' है।


नेताओं की थाली में देखो, छप्पन भोग सज रहे हैं,

आम आदमी के खाली पेट में, चूहे ढोल बजा रहे हैं।

वो कहते हैं—"धैर्य रखो, सब कुछ मंगलमय होगा,"

शायद लकड़ियों के चूल्हे पर ही, अब सबका अभ्युदय होगा।

सिलिंडर की टंकी खाली है, पर उम्मीदें पूरी भरी हैं,

महंगाई की डायन देखो, आज फिर से काफी हरी है।

सोच रहा हूँ सिलिंडर को अब, तिजोरी में बंद कर दूँ,

और इस किल्लत के दौर में, खुद को थोड़ा मंद कर दूँ।



विशेष नोट: इस कविता का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि खाली पड़े चूल्हों की 'गरमाहट' को व्यंग्य के माध्यम से बाहर लाना है।

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

शाम—ए—जिंदगी













जिंदगी की शाम चली आई है।
इक दिन नाम जिसका जुदाई है।।
मौत इक नाम ही सच्चाई है।
इसी बात को दुनिया दुहराई है।।

हर कोशिश के बाद राह निकल आई है।
यहां कौन बाप,कौन बेटा,कौन भाई है।।
अपनी जिंदगी में तो बस केवल तन्हाई है।
सबने उससे मिलने की कसम खाई है।।

जिसने देखे हैं,मीठे सपने अपने।
कब,किसके पूरे हुए ये सपने।।
आंख भर आई,बदन लगा तपने।
फिर भी हिम्मत कर,मंजिल बनाई हमने।।

रेत की ढेरी को महल समझा सबने।
समय की इक लहर ने तोड़े सपने।।
हमसफर कोई ना रहा,साथ छोड़ा सबने।
संकट झेला हमने,उम्मीद थी पूरे होंगे सपने।।

रात को रात,दिन को समझा दिन नहीं।
सपने अपने थे,सोचा मंजिल होगी यहीं।।
जहां दिन बीता,बीत गई रात वहीं।
सपने देखे थे,सोचा था होंगे यहीं कहीं।।

वक्त गुजरता रहा,शामें ढलतीं रहीं।
जिंदगी की गाड़ी,यूं ही घिसटती रही।।
सुख—दुख की पटरी पर,वो चलती रही।
सपनों को अपना मानना,ये गलती रही।।

पल—दो पल की थी रौशनी।
रात ही केवल अपनी रही।।
इतनी बढ़ी दुनिया,कोई अपना नहीं।
बड़े—बुजुर्ग कहते थे बातें सही।

बाजुओं पर यकीं कर,हौसलों में रख दम।
मंजिल मिलकर रहेगी,दुख हो जाएंगे कम।।
दूर होंगे सारे गम,आंखें होंगी नम।
सपने होंगे तेरे पूरे,खुशियां होंगी हरदम।।

खुश रहने वालों की शामें हसीं होती।
उल्लासित मन जागता,दुनिया सोती।।
जिंदगी में हार—जीत,होती नहीं पनौती।
खुशियां किसी एक की,होती नहीं बपौती।।

कर्ज का दुनिया में रैन बसेरा।
शरीर छूटेगा,ना रहेगा तेरा—मेरा।।
खाक होगा तन,श्मासान में उड़ेगी राख।
कुछ दिन गम,फिर रोएगी ना आंख।।

वहीं है मंजिल,तेरे इस विशाल तन का।
वक्त रहते जप ले तू,राम नाम का मनका।।
ऐसा ना किया तो न घर होगा ना घाट का।
जिंदगी की शाम है,इसे बना मनभावन सा।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

मन की जीत











जिंदगी का ऐ मन ऐतबार कर।
बड़ी हसीं है ये दुनिया,ना इंकार कर।।
कोई जंग जीती नहीं जाती,हार मानकर।
फिर शुरू कर कोशिश,जीत जानकर।।

पा लेगा तू मंजिल,ये ऐतबार कर।
छोड़ दोगे ये दुनिया,मान ले अगर।।
दिल में होगा गम,आंसू बहेंगे झर—झर।
उलझन है तो हल भी होगा,तू यकीं कर।।

हौसलों के दम पर,दुनिया जाती जीती।
बिना दिल में डरके,होती नहीं प्रीती।।
यही बात बतलाती,दुनिया की नीति।
जीते के साथ रहने की,रही सदा रीति।।

सारे फसाने छोड़कर,हकीकत पर यकीं कर।
मिल जाएगी मंजिल,कोशिश जो करे अगर।।
वो जिंदगी ही क्या,​जो जिये मर—मर।
पाओगे जो मंजिल,हो जाओगे अमर।।

राह की बाधाओं को,अब तू पार कर।
मुसीबत जो लाख आए,चलता जा निडर।।
आंधी—तूफान भी,हट जाएंगे घबराकर।
जीत मिलेगी तुझको,तू इसका यकीं कर।।

डर—डरकर किसी को ​जीत नहीं मिलती।
वक्त से पहले कभी कली नहीं खिलती।।
उगते सूरज की किरणे,अंधेरे को चीरती।
लाख मुसीबत बाद ही मंजिल है मिलती।।

मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।
यही सदा रही है,चारो युग की रीत।।
दुनिया के सारे कवियों ने गाए यही गीत।
अब उसको बिसरा,कहानी गई वो बीत।।

जीते के पीछे दुनिया,हारे का सहारा कोई नहीं।
अपने दम पर खड़ा हो जा,जीत मिलेगी कहीं ना कहीं।।
हर हार की वजहों का,तैयार कर खाता—बही।
दांतों में जहर रखकर,छिपकर बैठा रहता अहि।।

वक्त का इंतजार कर,तू लौटेगा जीतकर।
मन को तू मजबूत और इरादे फौलाद कर।।
हिम्मत अबकी फिर बांध,सांसों को खींचकर।
कोई तुझे हरा नहीं सकता,लौटेगा तू जीतकर।।

मंजिल पाने की मन में तू जिद कर।
कदम—कदम बढ़ाता जा,चलता जा राह पर।।
लक्ष्य पाने के लिए,योगी घूमे नगर—नगर।
फिर तू कैसे लौट सकता,भला निराश होकर।।

जीत मिलती उसी को,जिसके सपनों में जान होती।
मुर्दों की क्या भला कहीं पहचान होती।।
बागों में फूल खिलने से पहले,कलियां हैं होती।
मर्द ही आंसू पीते हैं,औरतें हैं रोतीं।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

मतवाली टोली












चल पड़ी मतवालों की टोली।
अब चले तोप,चाहें चले गोली।।
रंग जाए,चाहें खून से चोली।
खेलेंगे अब खून की होली।।

बहुत कर लिया हमने प्यार।
अब ना सहेंगे तेरी ललकार।।
हमने दिए फूल,तूने दिया अंगार।
एक के बदले,अब मारेंगे चार।।

पड़ोसी धर्म भी खूब निभाया।
शांति—सद्भाव तुझे ना भाया।।
सीमा पार तू चढ़कर आया।
काश्मीर को अपना बताया।।

देश में तूने आतंकवाद फैलाया।
अपनों को ही दुश्मन बनाया।।
भाई—भाई को खूब लड़वाया।
हिंदू—मुस्लिम को भिड़ाया।।

निर्दोषों का लहू बहाया।
धर्मस्थल पर आग लगवाया।।
अपनों को बम से उड़ाया।
तब तुझे मुस्लिम नजर ना आया।।

अब मुस्लिम को बताए भाई।
मारे अपनों को केवल कसाई।।
अब जान लो तुम सच्चाई।
नई एकता भारत में आई।।

अब मतवाले तुझे बताएं।
बूंद—बूंद लहू की कीमत चुकाएं।।
देश की एकता उनको भाए।
रक्षा देश की करने आए।।

हिंदू आए,मुस्लिम आए।
सिख—ईसाई वो भी आए।।
भारत के हैं,पाक ना भाए।
देश की एकता की गाथा गाएं।।

देश निराला,सैनिक मतवाला।
जाति—धर्म से दूर रहने वाला।।
कोई गोरा,तो कोई है काला।
भारतभूमि का है रखवाला।।

शीश काट तेरा वो लाएगा।
भारत मां का कर्ज चुकाएगा।।
तुझसे अपना बदला पाएगा।
भारत मां के गीत को गाएगा।।

भारत देश की अजब कहानी।
बूढ़ों में भी आती जवानी।।
वीर कुंवर सिंह थे अभिमानी।
उनकी कहानी,नहीं तुझे बतानी।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

बागी धरती













बागी धरती करे पुकार।
नहीं सहेंगे अब भ्रष्टाचार।।
बहुत सह चुके तेरा अत्याचार।
अब होगा आर या होगा पार।।

बागी धरती दिखाएगी तेवर।
सोना छोड़ हथियार बनेंगे जेवर।।
खून खौलेगा,फड़केगा बाजू।
कोई एक रहेगा, मैं या तूं।।

बागी धरती की यही पहचान।
जान रहे ना रहे,रहेगी शान।।
तिरंगे के लिए,सबकुछ कुर्बान।
गूंजेगा बस हिंदुस्तान—हिंदुस्तान।।

बागी धरती देश की शान।
मिटाये दुश्मनों के निशान।।
भारत मां के गाए गान।
चहुंओर हिंदुस्तान—हिंदुस्तान।।

बागी धरती,खूनी लाल।
दुश्मनों की खींच ले खाल।।
टूट पड़े तो बन जाए काल।
समझ ना पाए दुश्मन चाल।।

बागी धरती करे कमाल।
हर घर से निकले इक लाल।।
चमकती तलवार,लेकर ढाल।
दुश्मनों पर बन जाए काल।।

बागी धरती जवान महान।
हर घर में सेना का जवान।।
देशभर में होता गुणगान।
जय हिंदुस्तान—हिंदुस्तान।।

बागी धरती धरा है पावन।
चारों वेद में भरा बखान।।
भृगु मुनि और दर्दर महान।
जितना तुम कर लो गुणगान।।

बागी धरती की पहचान।
गंगा,सरयू,टोंस सीवान।।
रक्षा करते वीर जवान।
जय हिंदुस्तान—हिंदुस्तान।।

बागी धरती ने भरी हुंकार।
मिटकर रहेगा भ्रष्टाचार।।
ईमानदारी की जय—जयकार।
जली ज्योति वो बनी अंगार।।

बागी धरती की जो राह में आया।
समझो उसने जीवन गंवाया।।
दुश्मनों का नामोंनिशां मिटाया।
बलिया बागी नाम कहलाया।।

—अनीश कुमार उपाध्याय