पत्थरों के शहर में, एक जिंदा पत्थर की पुकार
ग्यारह साल हुए हैं मुझको, इस बिस्तर से चिपके,
जैसे कोई सूखी डाली, जमीं से हो बिछड़े।
गर्दन के नीचे की दुनिया, वीराना बन बैठी है,
रूह मेरी इस पिंजरे में, चुपचाप लेटी है।
मैं जिंदा हूं -पर क्या इसको जीवन कहते हैं?
जहां अपनी ही आंखों के आंसू, खुद नहीं बहते हैं।
चेहरे पर बैठी मक्खी भी, अब अपना हक़ जताती है,
हाथ हिलाने की हसरत, बस टीस बन रह जाती है।
देख नहीं पाता अब मैं, मां की झुकती कमर को, बढ़ते हुए सफ़ेद बालों और पिता की उस डगर को।
जो बूढ़े हाथ लाठी पकड़ते, वो मुझे नहलाते हैं, मेरे हिस्से का सारा दर्द, वो चुपचाप पी जाते हैं।
मेरे घाव नहीं रिसते, अब उनकी ममता रिसती है,
मेरी सांसों की खातिर, उनकी चक्की पिसती है।
हे ईश्वर! क्या यह सजा है या केवल आजमाइश है?
एक बेटा अपने मां-बाप की, मौत की न नुमाइश है।
मैं मौत नहीं मांगता, मैं तो बस विश्राम मांगता हूं,
अपनी ही अर्थी के कंधों का, थोड़ा सा मान मांगता हूं।
जो कानून जीवन देता है, वो पीड़ा क्यों नहीं पढ़ता?
क्यों एक बेबस का संताप, अदालतों में नहीं चढ़ता?
छीन लो ये चलती सांसें, तोड़ दो ये बेड़ियां, बहुत चढ़ लीं मेरी पीड़ा ने, जिल्लत की ये सीढ़ियां।
जब तक ये आंखें खुली हैं, बस बोझ बन कर रहूंगा, मुझको सोने दो गहरा, अब और न कुछ कहूंगा।
एक ग्यारह साल का सन्नाटा, अब ख़त्म होना चाहिए,
पथरानी इन आंखों को, अब कम से कम सोना चाहिए।
हे देश के विधाता! मेरी अर्जी पर जरा गौर करना,
मरने का हक दे दो मुझे, जीने से है अब डरना।
अनीश कुमार उपाध्याय
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