गैस का चूल्हा मौन खड़ा है, जैसे मौन व्रत धारी,
सिलिंडर बाबा रूठ गए हैं, भारी पड़ी सवारी।
किचन की रानी बैठी कोने में, आंखों में है पानी,
क्योंकि पाइपलाइन के वादों की, खत्म हुई है कहानी।
अब 'लाल परी' घर आती नहीं, बस दर्शन देकर जाती है,
सफेदपोशों के भाषण में ही, पूरी दाल पक जाती है।
कल तक जो 'सब्सिडी' का झुनझुना, हाथ में हमारे था,
आज पता चला वो झुनझुना, बस सपनों का सहारा था।
गैस सिलिंडर अब वस्तु नहीं, 'स्टेटस सिंबल' बन गया है,
पड़ोसी की छत पर खाली डब्बा, जैसे विजय स्तंभ तन गया है।
शादी-ब्याह के शगुन में अब, गहने-कपड़े कौन पूछता है?
दूल्हा वही है तगड़ा भाई, जिसके घर में सिलिंडर गूंजता है!
सड़क पर लाइन ऐसे लगी है, जैसे स्वर्ग का द्वार खुला हो,
हर आदमी अपना पर्चा पकड़े, जैसे जन्म-जन्मांतर से धुला हो।
एजेंसी का बाबू ऐसे घूरता है, जैसे हम कोई गुनहगार हैं,
"अगले महीने आना भाई," यही उसका परम सत्कार है।
वैज्ञानिक कह रहे हैं—मंगल पर पानी मिल जाएगा,
पर घर में चूल्हा जलेगा कैसे? ये कौन समझाएगा?
हमने भी अब 'डिजिटल इंडिया' का, नया मतलब निकाल लिया है,
सिलिंडर की फोटो दीवार पर चिपका कर, मन को मना लिया है।
धुआं नहीं है किचन में अब, क्योंकि आग ही गायब है,
विकास की इस दौड़ में देखो, हम सब बने नायब हैं।
चाय अब ठंडी ही अच्छी लगती है, फैशन का तकाजा है,
गरम खाने की जिद मत करना, यही 'नया दरवाजा' है।
नेताओं की थाली में देखो, छप्पन भोग सज रहे हैं,
आम आदमी के खाली पेट में, चूहे ढोल बजा रहे हैं।
वो कहते हैं—"धैर्य रखो, सब कुछ मंगलमय होगा,"
शायद लकड़ियों के चूल्हे पर ही, अब सबका अभ्युदय होगा।
सिलिंडर की टंकी खाली है, पर उम्मीदें पूरी भरी हैं,
महंगाई की डायन देखो, आज फिर से काफी हरी है।
सोच रहा हूँ सिलिंडर को अब, तिजोरी में बंद कर दूँ,
और इस किल्लत के दौर में, खुद को थोड़ा मंद कर दूँ।
विशेष नोट: इस कविता का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि खाली पड़े चूल्हों की 'गरमाहट' को व्यंग्य के माध्यम से बाहर लाना है।
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