ग्यारह सावन बीत गए पर, तन पत्थर सा मौन रहा,
अपनी ही जीवित अर्थी का, बोझ भला ये कौन सहा?
पलकों की कोरों में जम कर, पत्थर हुए थे सब आंसू,
आज न्याय की चौखट पर भी, सिसक उठे हैं सब आंसू।
विवश खड़ी थी न्याय की देवी, हाथ लिए वो कोरा पन्ना,
सोच रही थी— 'जीवन' देना या 'पीड़ा' को ही चुनना?
कानून की सूखी किताबों ने, सांसों की गिनती माँगी थी,
पर उस मां की आंखों ने तो, बेटे की मुक्ति माँगी थी।
थक गए थे बूढ़े कंधे, नहलाते उस चन्दन को,
हार गया था पिता बेचारा, सींच-सींच उस क्रंदन को।
आज जज की कांपती कलम ने, मूक गवाही दी होगी,
इंसानों के उस दर्द को, 'देव-दुहाई' दी होगी।
"ले जाओ इसे"— कहा कोर्ट ने, "इसे नींद अब आने दो,
पवित्र अग्नि की गोद में, जलकर पावन हो जाने दो।"
वो पाइप, वो नली, वो पिंजरा, आज अंततः टूटेगा,
कैद थी जो रूह बरसों से, उसका नाता छूटेगा।
कैसा अजब ये फैसला है, जिसमें रोकर मुस्काए,
बेटे को मरता देख के भी, मां 'आज़ादी' के गुण गाए।
हरीश! तुम्हारी सुप्त आंखों में, अब कोई डर न होगा,
अगला सवेरा जब आएगा, तुम पर कोई ज़बर न होगा।
अदालत का ये फैसला, इतिहास में एक मिसाल है,
जहां 'मृत्यु' ही सबसे सुंदर, करुणा का एक सवाल है।
जाओ! कि अब स्वर्ग की वादी, तुमको राह दिखाएगी,
ये धरती तुम्हारी तपस्या को, सदियों तक दोहराएगी।
अनीश कुमार उपाध्याय
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