जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
तेरे पीछे सारी दुनिया,ये जी लेगी।।
बस बहुत हुआ,अब ना कर दिल्लगी।
सूरज उगेगा,चांद निकलेगा,कली खिलेगी।।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
दुनिया इक फसाना है,तू इक सच्चाई।।
सच की राह पर चलने वालों ने मंजिल पाई।
हर धर्म ग्रंथों ने,यही बात बतलाई।।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
सच की राह में,लाख मुसीबतें आएंगी।।
तेरे हौसलों के आगे,वो शीश झुकाएंगी।
जीत होगी और दुनिया तेरे गीत गाएगी।।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
कदमों पर यकीं,हौसले फौलाद कर।।
तेरे राह में रोड़े भी मिले लाख अगर।
दिल को मजबूत,लक्ष्य पर रहे नजर।।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
हरिश्चंद्र भी सत्य की राह पर थे चले।।
खुद हुए नीलाम,पत्नी—बेटे थे बिके।
बिना कर वसूली दिए,रोहित ना जले।।
अंत में उन्हें तब मंजिल मिली।
सच की राहों में कांटे लाख होते।।
फरेब की राहें सपाट हैं होते।
लेकिन फरेबी को मंजिल नहीं मिलती।।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
सत्य का अगर तू,अंत तक पकड़े रहा दामन।।
सच कहूं कहता है मेरा ये मन।
मंजिल मिलेगी,तू भोगेगा नंदन वन।।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
बुराई करने वाले,अक्सर फलते—फूलते।।
लेकिन ये भी है हकीकत,वो मंजिल नहीं पाते।
खूब तेजी से जो भागते,बीच मंजिल से लौटते।।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
अपने हौसलों पर कर यकीन अगर।।
मंजिल को पाते हैं केवल वीर नर।
सत्य की राह पर चलने की तू कोशिश कर।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
हौसलों के बूते केवल मंजिल जाती जीती।।
तीनों युगों से चली आ रही यही रीती।
राजनीति में जैसे बिनु भय होय न प्रीति।।
जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
अगर तू ठान ले,तो तेरे दिल की कली खिलेगी।।
तू मनायेगा जीत का जश्न और दुनिया जलेगी।
तू पाएगा मंजिल,दुनिया हाथ मलेगी।।
—अनीश कुमार उपाध्याय

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