जिंदगी की जंग में, हमने इतना जाना है।
कौन अपना,कौन पराया,बस उन्हें पहचाना है।।
वक्त ने हमपे, ऐसा सितम ढाया है।
अपनों ने रुसवा किया,गैरों ने अपनाया है।।
जिनसे वफा की, हमें उम्मीद थी।
बेवफा वही निकले, जिन्हें पाने की जिद थी।।
वो कहते थे, साथ देंगे जिंदगी भर।
थोड़ी सी आंधी से, वो गए मगर डर।।
बीच भंवर में, हमको छोड़कर।
खुद पार हो गए, दरिया तैरकर।।
आज भी किनारे से कहते,साथ हैं तुम्हारे।
हमको भूलना मत, हम हैं तुम्हारे प्यारे।।
अब कोई हमें बताये, हम उन्हें कैसे भूल पाएं।
उनकी बेवफाई से कह दो, हमें ना सताये।।
जिन्हें अपना समझ, हम बेफिक्र हो चले थे।
वो ही राह—ए—मंजिल, डर—डर कर चले थे।।
बीच भंवर में छोड़, अब दूर जा रहे हैं।
जन्मभर के रिश्तों को, वो भूल जा रहे हैं।।
इस जन्म में मिलने की, अब रही उम्मीद नहीं।
रोज होली, रोज दीवाली, होती हमेशा ईद नहीं।।
वो जश्न मना रहे थे, गीत गुनगुना रहे थे।
हम आंसुओं से अपने, गम को मिटा रहे थे।।
वो सज—संवर रहे थे, पिया की याद में।
हम डूब—उतर रहे थे, गम—ए—बर्बाद में।।
वो रुठकर हमसे, बहुत दूर जा रहे थे।
हम साये में अपने,टूटते जा रहे थे।।
बिखर गई थी उम्मीदें, टूट गए थे सपने।
दूर हो गए थे, जो कभी थे अपने।।
दिल में दबाये, यादों को उनके।
वो शर्बती आंखें,सुरीली आवाज सुनके।।
आंखों ही आंखों में,जिंदगी की शाम काट रहे थे।
उनकी यादों को हम, अपने से बांट रहे थे।।
वो चंचलता से मुस्कुराना,कहकहे लगाना।
कभी पास आना, कभी दूर जाना,कभी दिल में उतर जाना।।
ठहरे हुए पानी में,जैसे कंकड़ मार जाना।
अरसे से शांत लहरों को,जैसे फिर से जगाना।।
अब तो आंखों के सामने,उनका अक्स है बसता।
अब तो उनके दिल में,कोई दूसरा शख्स रहता।।
वो खुश हैं अपनी जिंदगी में,हम गम में चूर हैं।
वो दूर हैं बहुत हमसे,हम जग में मजबूर हैं।।
राह चलते हुए तो,अब लोग हैं टोकते।
कहो कैसे हुई मुहब्बत,पूछते राह रोकते।।
मेरे दिल के जख्मों से टपकती खूनी की लाली।
उनकी मीठी बातें भी, अब लगती हैं गाली।।
—अनीश कुमार उपाध्याय

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