शनिवार, 26 अप्रैल 2014

इंतहा...इंतहा...इंतहा











इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।
कभी इंतजार की, कभी कंटीली राह की।।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।
कभी फूलों की राह की,कभी कांटो के ताज की।।
कभी राजकाज की, कभी सुर—साज की।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।।

कभी प्या की, कभी दिल बेकरार की।
कभी मंजिल की चाह की,कभी सुगम राह की।।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।
कभी मीठी वो बातें, कभी दुत्कारती यादें।
कभी कटती नहीं राहें, कभी बंटती नहीं चाहें।।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।

वो फूलों सा हंसना, वो कांटों में फंसना।
वो कीचड़ में धंसना, वो यादों में बसना।।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।
वो वक्त का गुजरना, वो मीठे पानी का झरना।।
वो रात का अंधेरा, चौंककर तेरा डरना।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।

कभी गुस्सा, कभी झिड़की, वो यादों की खिड़की।
वो गलियों से तेरा गुजरना, दिल से आहे भरना।।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।
कभी नाम का तेरा लेना, कभी खत का भेजना।।
कभी चुपके से गलियों में, तेरा जो मुस्कुराना।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।

निकल पड़े राह पर, पर जाना है कहां!
जहां तेरी मंजिल मिले, बस जाना है वहां।।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।
तेरी यादों में बसता, मेरा सारा जहां।।
क्या सुंदर सी जिंदगी थी,मत पूछो अहा।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।

बरसों बाद आज मिले जो, तेरा बेगाना सा बनना।
बीतीं सारी यादों को, भूली—बिसरी याद कहना।।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।
मेरी प्यार भी बातों को, अब गहना ना समझना।।
कभी आंखों में बसने की बातें कह, आंखों से दूर रहना।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।

अब तो तुम पहुंचे जहां, कोई लौटता नहीं वहां।
हम अकेले रह गए, सूना पड़ा सारा जहां।।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।
यहीं खत्म हुई कहानी, गुम हुई जिंदगानी।।
ना राजा बचे ना रानी, धरी रह गई जवानी।
इंतहा...इंतहा...इंतहा...हां...हां...इंतहा।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें