सोमवार, 28 अप्रैल 2014

...तुझे मंजिल मिलेगी













जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
तेरे पीछे सारी दुनिया,ये जी लेगी।।
बस बहुत हुआ,अब ना कर दिल्लगी।
सूरज उगेगा,चांद निकलेगा,कली खिलेगी।।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
दुनिया इक फसाना है,तू इक सच्चाई।।
सच की राह पर चलने वालों ने मंजिल पाई।
हर धर्म ग्रंथों ने,यही बात बतलाई।।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
सच की राह में,लाख मुसीबतें आएंगी।।
तेरे हौसलों के आगे,वो शीश झुकाएंगी।
जीत होगी और दुनिया तेरे गीत गाएगी।।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
कदमों पर यकीं,हौसले फौलाद कर।।
तेरे राह में रोड़े भी मिले लाख अगर।
दिल को मजबूत,लक्ष्य पर रहे नजर।।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
हरिश्चंद्र भी सत्य की राह पर थे चले।।
खुद हुए नीलाम,पत्नी—बेटे थे बिके।
बिना कर वसूली दिए,रोहित ना जले।।

अंत में उन्हें तब मंजिल मिली।
सच की राहों में कांटे लाख होते।।
फरेब की राहें सपाट हैं होते।
लेकिन फरेबी को मंजिल नहीं मिलती।।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
सत्य का अगर तू,अंत तक पकड़े रहा दामन।।
सच कहूं कहता है मेरा ये मन।
मंजिल मिलेगी,तू भोगेगा नंदन वन।।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
बुराई करने वाले,अक्सर फलते—फूलते।।
लेकिन ये भी है हकीकत,वो मंजिल नहीं पाते।
खूब तेजी से जो भागते,बीच मंजिल से लौटते।।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
अपने हौसलों पर कर यकीन अगर।।
मंजिल को पाते हैं केवल वीर नर।
सत्य की राह पर चलने की तू कोशिश कर।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
हौसलों के बूते केवल मंजिल जाती जीती।।
तीनों युगों से चली आ रही यही रीती।
राजनीति में जैसे बिनु भय होय न प्रीति।।

जा मुसाफिर जा,तुझे मंजिल मिलेगी।
अगर तू ठान ले,तो ​तेरे दिल की कली खिलेगी।।
तू मनायेगा जीत का जश्न और दुनिया जलेगी।
तू पाएगा मंजिल,दुनिया हाथ मलेगी।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

रविवार, 27 अप्रैल 2014

बंजारा मन...











मन बंजारा, वक्त का मारा।
तुझे पुकारे,आजा—आजा।।
मन गति,दीया की जलती बाती।
हवा का झोंका,लौ को झुकाती।।

मन बंजारा, हवा के जैसा।
तेरी गति,दीया की बाती।।
हवा वक्त का है इक झोंका।
संभल जा वरना,खाएगा धोखा।।

मन बंजारा,पानी जैसा।
दुनिया उसकी,जिसका पैसा।।
ये तन तेरा,बुलबुले जैसा।
हुआ ना किसी,तो तेरा कैसा!

मन बंजारा,आकाश जैसा।
इक चांद है,नगण्य तारों में।।
काली अमावस्या,गुल हुआ चांद।
जीवन वैसे,दिन—रात है जैसे।।

मन बंजारा,धरती जैसा।
जैसी मेहनत,काटो वैसा।।
भाई—भाई में आग लगाए।
खुशियों को सारी,ये जलाए।।

मन बंजारा,भंवरा जैसा।
फूल चूसकर,रस उड़ जाए।।
फूल बेचारा,क्या कर पाए।
फिर भी हंसकर,जीवन बिताए।

मन बंजारा,शीशे जैसा।
सामने जो आए,अक्स वैसा।।
लाख सुंदरता,तू चढ़ाए।
वक्त उसे भी मिट्टी बनाए।।

मन बंजारा,रास्ते जैसा।
उस पर राही चलता जाए।।
मंजिल आए,रास्ता छूट जाए।
यहीं मुसाफिर पूरा थक जाए।।

मन बंजारा,पेड़ जैसा।
पंथी आए,छाया पाए।।
गरीब घर का,चूल्हा जलवाए।
श्मसान में देह को राख बनाए।।

मन बंजारा,लोहे जैसा।
शत्रु वार को खुद झेल जाए।।
थोड़ा चूके तो मौत लाए।
कभी ढाल,भाला कहलाए।।

मन बंजारा, वक्त को समझे।
मन की गति,कोई समझ ना पाए।।
जो समझे वो ज्ञानी कहलाए।
भवसागर से पार हो जाए।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

बढ़े चलो—बढ़े चलो










आज वक्त है पुकारता।
हुं—हुं कर हुंकारता।।
कर्म पथ पर बढ़े चलो तुम।
कभी बाधाओं से न हटो तुम।।

बढ़े चलो—बढ़े चलो।
वक्त की आवाज सुन चले चलो।।
कर्म पथ से डिगो नहीं।
कदम—कदम बढ़ाते चलो।।

वक्त की पुकार सुनो।
जीत की गिनती गिनो।।
बढ़े चलो—बढ़े चलो।
कर्म पथ पर बढ़े चलो।।

दुश्मनों की छाती दलो।
गीत फतह के गाते चलो।।
बढ़े चलो—बढ़े चलो।
तुम कहीं रुको नहीं।।

तुम कभी झुको नहीं।
जीतना है मंजिल तुम्हें।।
बढ़े चलो—बढ़े चलो।
शत्रुदल की छाती पर।।

चढ़े चलो—चढ़े चलो।
बढ़े चलो—बढ़े चलो।।
मुसीबतें जो राह की।
कचलते चलो,कुचलते चलो।।

दुश्मनों का सीना चीर दो।
बहुत धर लिए धीर तो।।
अब तुम उसको पीर दो।
वक्त की पुकार सुनो।।

बढ़े चलो—बढ़े चलो।
शेर की तरह दहाड़ते चलो।।
पर्वतों को कर दो खंड—खंड।
नदियों की दिशा मोड़ दो।।

चढ़े चलो—बढ़े चलो।
तुम्हें नहीं है रुकना।।
दुश्मन के आगे झुकना।
शत्रु का मान मर्दन करो।

बढ़े चलो—बढ़े चलो।
अब सीमा पार चले चलो।।
दुश्मन को भी पता चले।
अब वो फिर खता न करे।।

चढ़े चलो—बढ़े चलो।
फतह हासिल करके मानो।।
जीत तुम निश्चित जानो।
शत्रु वेधो बानो—बानो।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

माधो ! कृष्ण ना भये दस—बीस














माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
एक तुम्हारे संग जाएंगे मथुरा।।
गोकुल सूना,यमुना सूनी।
गोपियन अंखियां होंगी खूनी।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
इक तोहे संग मथुरा जइहें,बाकी गोपियन के ईश।।
कइसे रहियें यशोदा मइया,बिन बाल कन्हैया।
नंद बाबा जी ना सकिहें,तड़प—तड़प मरि जइहें।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
इक अकेले नंदलाल,जे गोपियन के ईश।।
रास रचावत,मन के भावत।
माखन—मिश्री के भोग लगावत।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
रथ के आगे, सोये गोपियां।।
आंखों से झर—झर बहतीं असुआं।
नैन खुले और कृष्ण समाये।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
कृष्ण जुदाई,मन नाही भाये।।
जैसे यम हमें लेने को आए।
रुक जाओ,नैनन कृष्ण समाए।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
राह रोके और रोवत गोपियां।।
कभी रथ के आगे सोवत गोपियां।
ऐसा जुल्म करो मत कोई।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
कृष्ण बुझावत,बलिराम समझावत।।
लाख मनावन,गोपियन लौटावन।
गोपियां भूमि परे लोटियावत।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
समयचक्र गति चलती जाए।।
राधा आगे खड़ी हो जाए।
कान्हा अब तो रुकि जाओ।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
तब माधो अब रथ से उतरे।।
राधे को समझावे बिटिया मान मेरी बात।
जेहि कारण जन्म लिया,उहां ही वो जात।।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
कंस वध कर वो फिर आवेंगे।।
मात—पिता का कर्ज उतारेंगे।
एही बात सुनि राधे हटी।

माधो!कृष्ण ना भये दस—बीस।
रथ हांकि मथुरा चले श्रीकृष्ण ईश।।
मथुरा में अब बजी बधइयां।
आई गए अब कृष्ण—कन्हैया।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

रोकर भी हंसना होता है...












रास्ते जो हसीं होते,इमारतों को कौन पूछता।
जिंदगी जो सपाट होती, मंजिल को कौन ढूंढता।।
जीवन की टेढ़ी—मेढ़ी राहें,हर लम्हा है टूटता।
कभी मन बाग—बाग,कभी है वो रुठता।।

जीवन की हर गली, हर मोड़ का।
अपना इक किस्सा होता है।
कभी संकरी गलियां,कभी चौड़ी सड़क मिलती है।
यही जिंदगी है मेरे दोस्त,कभी हंसती,कभी रोती है।।

जीवन की हर राह का,अपना फसाना होता है।
दिल में गम,आंखों में आंसू,फिर भी मुस्कुराना होता है।।
चोट जो लगती दिल पर, कहकहे लगाना होता है।
खुद अंधेरी राहों पर चलकर,उन्हें जगाना होता है।।

दिल पर हर तहरीर लिख,सबको बताना होता है।
अपना दिल रोये लाख मगर,उन्हें हंसाना होता है।।
दिल की हर सच्चाई पर,परदा दिखाना होता है।
खुद लहू की घूंट पीकर भी, खुशी जताना होता है।।

राह—ए—जिंदगी की, क्या बात बतलाउु तुझको।
खुद गम की राहों पर चलकर,तन तपाना होता है।।
कभी हंसते हुए रोना,कभी रोकर मुस्कुराना होता है।
सूरज की उगती लाली देख,दिन का एहसास कराना होता है।।

चांद की शीतल छाया को,रात बताना होता है।
खुद गम दुनिया का लेकर,जिंदगी हसीं जताना होता है।।
यही जीवन की हकीकत,रोकर भी मुस्कुराना होता है।
खुद पथरीली राहों पर चल, उनके लिए फूल बिछाना होता है।।

गम से चूर रहती जिंदगी,उन्हें हूर बनाना रहता है।
खुद लाख मुसीबत झेलकर,उन्हें शउर सिखाना होता है।।
मगरुर—ए—जिंदगी अपनी, वो नशे में चूर है।
हम तबाह—ए—राह पर,वो हमसे बहुत दूर हैं।।

वो सज—संवर रहे, हम धूर—धूर हैं।
मेरे दिल पे चलते खंजर,वो बने नूर हैं।।
इतने बड़े जहां में, अकेले हमहीं मजबूर हैं।
उन्हें चिंता मेरी नहीं,हम जो गम में चूर हैं।।

हम रास्ते उनके,वो मंजिल हैं हमारी।
हम बिखरे संसार में,उनकी आसमान की तैयारी।।
हम चलकर थक गए,वो बुलंदी छू रहे हैं।
वो बसंत बहार के झोंके, हम बहती लू हैं।।

उनका मौसम खुशगवार,अपना गमों का वार है।
उनके पैरों के नीचे फूल,अपनी तो तलवार है।।
मेरा दिल भी अजीब,उन पर पूरा ऐतबार है।
दिल सौ बार जख्मी हुआ,फिर भी यकीं बार—बार है।।

मिल जाए मंजिल मेरी,मुझको ये उम्मीद है।
मेरी जिंदगी में सारे मौसम,उनके लिए सब ईद है।।
हम राह—ए—संसार हैं,वो खड़ी हुई इमारत।
वो बुलंदी आसमान की, हम जमीं की परत।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

मन गाना गाए











जागो..जागो..जागो,रात गई सूरज उग आया।
कागा बोला,कोयल बोली,मुर्गे ने भी बाग लगाया।।
जो सोया,वो खोता है, जो जागा वो पाया।
सिद्ध पुरुष और संतो ने यही बात बतलाया।।

सूरज की पहली लाली देख,जो इंसान जग जाता है।
सुख—वैभव कदमों में होता,अच्छी सेहत पाता है।।
रोग—व्याधि सब मिट जाते,लंबी आयु पाता है।
जो देर तक सोया रहता,अपना सबकुछ खोता है।।

सफल राह पर चलने को,जल्दी तुम्हें जागना होगा।
एक बार अजमाकर देखो,सारे रोग को भागना होगा।।
झूठ—फरेब से दूर रहकर,सच्चाई पथ पर चलना होगा।
नींद देखो फिर गहरी होगी,चिंता—फिकर कोई ना होगी।।

सारे काम समय पर होंगे,वहीं होगा जो तुम चाहोगे।
यही हकीकत है मेरे भाई,वहीं काटोगे,जो बोओगे।।
कर्म पथ पर आगे बढ़ो,अच्छा फल तुम पाओगे।
जो मेरी बात फिर भी ना समझे,तब तुम पछताओगे।।

जाग जाओ सूरज उग आया,आसमां पर लाली छाई।
मुरझाए कमलदल में भी,नवजीवन संचार ले आई।।
कहीं उंचे पर्वत खड़े,कहीं खूब गहरी है खाई।
देखो तो हर कोने में, सूरज ने किरणें पहुंचाई।।

सूरज उग आया, काली—काली रात गई।
कल जो हुआ उसे बिसराओ,बीती अब वो बात भई।।
नवउर्जा से नये जीवन का,अब तुम संचार करो।
बीती बातें बिसारकर,नये सिरे से विचार करो।।

किसी सफर की यात्रा, पहले कदम से होती शुरुआत।
किसी पेड़ की सृजना, सीधे नहीं होई जात।।
बीज पड़त,अंकुर फूटत, फिर उगत हैं उसमें पात।
माली सींचत, कोड़त—रोपत, तब बने वृक्ष विशाल।।

एक समय ऐसा भी आए, ग्रस जाए उसको भी काल।
कर्म पथ पर आगे तुम बढ़ो,मत पूछो कोई सवाल।।
कर्म करोगे,फल मिलेगा,इतना तुम निश्चित जानो।
बुरे कर्म का बुरा नतीजा, अच्छे का अच्छा मानो।।

जागो अब भी देर ना हुई,करो नई शुरुआत।
कर्मपथ पर आगे बढ़ने की,अब सोचो केवल बात।।
राह में जितने रोड़े आएंगे, कैसे करोगे आघात।
चक्रव्यूह रचने वालों को,कैसे दोगे तुम मात।।

दिन ढलेगा,सूरज डूबेगा,आएगी काली रात।
कर्मपथ पर बढ़ते ही रहना,कट जाएगी सारी रात।।
दिन निकलेगा,सूरज उगेगा,मन में रहे विश्वास।
चाहें खड़ा पर्वत हो जाए,चाहें उगे कटीली घास।।

जब कभी जीवन में,घनघोर अंधेरा छा जाए।
जब जीवन पथ पर,कोई बात समझ ना आए।।
समझो कि सवेरा दूर नहीं,बस केवल सूरज उग आए।
सूरज निकलेगा,दुख विसरेगा,मन तो अब गाना गाए।।

—अनीश कुमार उपाध्याय

भारत देश महान












देश का दुश्मन ललकार रहा है।
सीमा पर खड़ा फुफकार रहा है।।
देश की एकता उजाड़ रहा है।
अपनी जमीं पर झंडे गाड़ रहा है।।

अब मत सोओ,जागो—जागो।
अपनी धरा का,इंच—इंच मांगो।।
भारत माता का कर्ज उतारो।
अपने भविष्य की किस्मत संवारो।।

बहुत सो लिए, अब तो जागो।
खून बहाया, उसने अपनों का।।
उससे सारा हिसाब तुम मांगो।
अब मत सोओ,जागो—जागो।।

देश पड़ोसी,भूल गया वो।
पिछली हार को भूल गया वो।।
उसको फिर से याद दिलाओ।
बढ़ो जवानों,आगे आओ।।

जमा नहीं है,लहू तुम्हारा।
दुश्मन को ये बोध कराओ।।
उसके मान का मर्दन कर।
रणभूमि में उसे हराओ।।

जागो—जागो,अब मत सोओ।
शांति का पाठ खूब पढ़ाया।।
पड़ोसी धर्म भी खूब निभाया।
उसने सिर काट तोहफा भिजवाया।।

उसकी लंका में अब आग लगाओ।
देश की ताकत उसको बतलाओ।।
बहुत जख्म दिए, अब मत सहो।
अब तो सारे,एकजुट रहो।।

हिंदू,मुस्लिम,सिख,इसाई।
भाई—भाई हैं,बनो ना कसाई।।
उसकी फितरत केवल लड़ाई।
वापस लौटो,फिर बनो भाई।।

प्रेम,एकता और भाईचारा।
सभी धर्म आंखों का तारा।।
यही रहा है पहचान हमारा।
बोल हमारे,गान तुम्हारा।।

बजे प्रेम का इकतारा,झूमे दुनिया सारी।
बोली—भाषा अलग—अलग,संस्कृति एक हमारी।।
हर बोली की अपनी मिठास,जगह—जगह है खास।
कहीं गूंजता अल्लाह अकबर,घुलती कानों में मिठास।।

कहीं राम,ईसा,मूसा का होता है गुणगान।
कहीं कृष्ण की भक्ति से,पूजे जाते रसखान।।
सारी बातों का मोल एक,चाहें कोई होवे भगवान।
प्रेम,एकता,भाईचारे से,भारत देश बना महान।।

—अनीश कुमार उपाध्याय